जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है

अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है.

तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो

हे अग्नि ! हम जिन देवों की स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हमारे समीप लाओ एवं हमें मारने की इच्छा से घूमने वाले राक्षसों को हम से दूर भगाओ. हे दिव्य गुणों वाले अग्नि ! हमारे नमस्कार आदि से प्रसन्न तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो.

उदर (पेट) में संचित तेरा मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे

हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता सूर्य को जानते हैं. हे रोगी! मैं इसी बाण से तेरे मूत्रादि रोगों को नष्ट करता हूं. उदर (पेट) में संचित तेरा मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे.

रोग पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं

हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं.

रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए

हे व्याधिग्रस्त पुरुष! तेरी दीर्घायु के लिए हम तुझे गाय के समान लाल रंग से ढकते हैं. यह पुरुष पापरहित हो कर कामला आदि रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए.

तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ

हे मधु लता! तू मेरी जीभ के अग्र भाग पर शहद के समान स्थित हो तथा जीभ की जड़ में मधु रस वाले मधु नामक जल वृक्ष के फूल के रूप में वर्तमान रह. तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ.

ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है

ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है, "मैं ने तत्त्व ज्ञान होते ही द्यावा और पृथ्वी को सभी ओर से प्राप्त कर लिया है तथा में ही ब्रह्म से प्रथम उत्पन्न प्राणी एवं भौतिक पदार्थ हूं. जिस प्रकार वक्ता के समीपवर्ती जन वाणी को तत्काल सुन और समझ लेते हैं, उसी प्रकार यह परमात्मा संसार में स्थित, सब के पोषण का इच्छुक एवं वैश्वानर के रूप में सब का पोषक है."

वह रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है

बांमी बनाने वाली दीमक पृथ्वी के नीचे स्थित जलराशि से रोग निवारक जड़ीबूटी को उखाड़ती है. वह अतिसार आदि रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है.

दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर

हे नील नामक ओषधि ! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर.

तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो

हे अग्नि ! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता चंद्र को जानते हैं

हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता चंद्र को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! मैं उसी बाण से तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकले और धरती पर गिरे.

मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें

हे अग्नि ! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो.

हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें

हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर थारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

जो शत्रु हैं, वे हमें प्राप्त न कर सकें

अस्त्रशस्त्र आदि से ताड़ित करने वाले जो शत्रु हैं, वे हमें प्राप्त न कर सकें, सामने आ कर हिंसा करने वाले हमें न पा सकें. हे परम ऐश्वर्य ऐश्वर्य संपन्न इंद्र देव ! शत्रुओं द्वारा बारबार छोड़े गए अनेक प्रकार के मुखों वाले जो बाण हैं, उन्हें हम से दूर स्थान में गिराओ.

इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया

शत्रु विनाशक एवं समस्त प्राणियों के मित्र इंद्र ने वृत्र राक्षस को आसुरी प्रजाओं के समान मार डाला. जिस प्रकार यज्ञ करते हुए अंगिरा गोत्रीय भृगुओं के यज्ञ का आधार गौ का हरण करने वाले बल नामक असुर को मार डाला था, उसी प्रकार इंद्र ने वृत्र का हनन किया. इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया.

बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं

स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं.

सैकड़ों प्रकार की हिंसा को रोको एवं संतान सहित इन का विनाश करो

हे सब के विषय में जानने वाले अग्नि ! तुम गुहा में निवास करने वाले राक्षसों को जानते हो. हे मंत्र द्वारा वृद्धि पाते हुए अग्नि! इन राक्षसों द्वारा सैकड़ों प्रकार की हिंसा को रोको एवं संतान सहित इन का विनाश करो.

इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं

हे अग्नि ! आप और परम ऐश्वर्य वाले इंद्र, हमारे दिए गए हवि को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें. राक्षस, सब का भक्षण करने वाले दस्यु एवं इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं.

शत्रुओं के द्वेषपूर्ण बाण हम से दूर रह कर उन्हीं के समीप जाएं

हे इंद्र! जिस प्रकार गरमी से व्याकुल गाएं वट वृक्ष की छाया में शरण लेती हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं के द्वेषपूर्ण बाण हम से दूर रह कर उन्हीं के समीप जाएं.

यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है

घाव को पकाने वाली यह जड़ीबूटी अर्थात् मिट्टी खेत से खोद कर लाई गई है. यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है.

दोनों हाथों और दोनों चरणों को सुख प्राप्त हो

मेरे शरीर के अवयव सिर का रोग शांति के रूप में कल्याणकारी हो. मेरे चरण आदि निम्न अंगों को सुख मिले. मेरे दोनों हाथों और दोनों चरणों को सुख प्राप्त हो. मेरे शरीर के मध्य भाग को नीरोगता प्राप्त हो.

हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो

गंगा आदि नदियों की जो अक्षय धारा एवं झरने सदा बहते रहते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में कभी नहीं सूखते हैं, उन के कारण हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो.