स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं

हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं.

जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं

तेजस्वी एवं बंधन से छुड़ाने वाले तारे उदित हों. वे तारे पुत्र, पौत्र आदि के शरीर में होने वाले यक्ष्मा, कुष्ठ आदि रोगों एवं उन के फंदों से हमें छुड़ाएं जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं.

स्वर्ग के समान आनंद तुम्हें यहां भी प्राप्त हो

हे इंद्र ! तुम नवीन के समान सोमरस से अपना पेट उसी प्रकार भर लो जिस प्रकार स्वर्ग अमृत से पूर्ण करते हो. इस निचोड़े गए सोमरस के मद से संबंधित उत्तम स्तुति तथा स्वर्ग के समान आनंद तुम्हें यहां भी प्राप्त हो.

यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए, समस्त रोगों की ओषधि है

जंगिड़ वृक्ष से निर्मित यह मणि दूसरों को पराजित करती है, कृत्या आदि भक्षकों को नष्ट करती है तथा समस्त रोगों की ओषधि है. यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए.

जो आयुध हमारे ऊपर चलाया जाता है, उसे हम से दूर करो

हे वरुण! हमारे समीपवर्ती शत्रु द्वारा चलाया हुआ जो आयुध हम तक आता है अथवा दूरवर्ती शत्रु का जो आयुध हमारे ऊपर चलाया जाता है, उसे हम से दूर करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग आदि के कारण असफल न होने वाले शस्त्रास्त्रों से हमें दूर रखो.

मनुष्य निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें

हे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें.

मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं

मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं.

गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें

द्युलोक से संबंधित प्राची आदि चार दिशाओं एवं भूलोक की आग्नेयी आदि चार दिशाओं ने एवं इन दिशाओं के अधिष्ठाता इंद्र आदि देवों ने पहले गर्भ को पूर्ण किया था. वे सभी देव इस समय गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें.

हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें

हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर थारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें.

शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें

हाथी, घोड़े और रथों से युक्त बहुत से शत्रु सैनिक हमें जीतने में असमर्थ हो कर हार जाएं. अल्प संख्या वाले शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें, बांस की ऊपरी शाखाएं जिस प्रकार दुर्बल होती हैं, हम से पराजित हो कर धनहीन बने शत्रु उसी प्रकार समृद्धि रहित हो जाएं.

शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके

आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुथ हमारी ओर आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके.

वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे

मैं जलों के तेज, ज्योति, ओज और बल तथा वनस्पतियों का वीर्य उसी प्रकार धारण करता हूं, जिस प्रकार इंद्र में इंद्रियों के असाधारण चिह्न वर्तमान हैं. इसीलिए वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे.

वह रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है

बांमी बनाने वाली दीमक पृथ्वी के नीचे स्थित जलराशि से रोग निवारक जड़ीबूटी को उखाड़ती है. वह अतिसार आदि रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

विजय के कारण प्राप्त उस पित्त को ओषधि का रूप दे दिया

हे ओषधि! सब से पहले गरुड़ उत्पन्न हुए. तू उन के शरीर में पित्त दोष के रूप में थी. आसुरी माया ने गरुड़ से युद्ध कर के पित्त को जीत लिया एवं विजय के कारण प्राप्त उस पित्त को ओषधि का रूप दे दिया.

कोई भी इस की हिंसा करने में समर्थ न हो

हे विश्वे देव! वसु एवं आदित्य देवो! दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष की रक्षा करो एवं दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष के विषय में सावधान रहो. इस का सजातीय अथवा विजातीय शत्रु इस के पास तक न आ सके. कोई भी इस की हिंसा करने में समर्थ न हो.

तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो

हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं.

बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं

स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं.

तू मेरे वीरों की हत्या नहीं कर सकेगा

हे शत्रु ! यदि तू हमारी गायों, घोड़ों एवं सहायता करने वाले सेवकों की हत्या करता है तो में सीसे से तुझे मारूंगा. तू मेरे वीरों की हत्या नहीं कर सकेगा.

शरीर के छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं

हे शरीर के निचले भाग में वर्तमान नाड़ी! हे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित नाड़ी! हे शरीर के मध्य भाग में वर्तमान नाड़ी! तू भी स्थिर हो जा. रुधिर का प्रवाह बंद करने के लिए छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं.

वह परमात्मा किस प्रकार का है?

वह सूर्यात्मक परमात्मा हमारा पालनकर्ता, जन्मदाता एवं बंधु है. वह स्वर्ग आदि स्थानों एवं वहां प्राप्त होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है. एकमात्र वही इंद्र आदि देवों का नाम रखने वाला है अथवा वह स्वयं ही इंद्र आदि नाम धारण करता है. इस प्रकार के परमात्मा को सभी प्राणी यह पूछते हुए प्राप्त होते हैं कि वह परमात्मा किस प्रकार का है?

ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों

वाणी के स्वामी ब्रह्म का हम आह्वान करते हैं. हमारे द्वारा आह्वान किए गए ब्रह्म हमें अपने समीप बुलाएं. हम संपूर्ण ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों.

हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे

घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए. जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.