हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो

गंगा आदि नदियों की जो अक्षय धारा एवं झरने सदा बहते रहते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में कभी नहीं सूखते हैं, उन के कारण हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो.

ब्रह्म राक्षस और राक्षसी से पकड़े हुए इस पुरुष को छुड़ाओ

हे ढाक, गूलर आदि दस वृक्षों से बनी हुई मणि! ब्रह्म राक्षस और राक्षसी से पकड़े हुए इस पुरुष को छुड़ाओ. उस ब्रह्म राक्षसी ने इसे शरीर के जोड़ों में पकड़ा हुआ है. हे वनस्पति से निर्मित मणि! तू इसे जीवित प्राणियों के लोक में पहुंचा अर्थात् इसे पुनः जीवित कर.

ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है

ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है, "मैं ने तत्त्व ज्ञान होते ही द्यावा और पृथ्वी को सभी ओर से प्राप्त कर लिया है तथा में ही ब्रह्म से प्रथम उत्पन्न प्राणी एवं भौतिक पदार्थ हूं. जिस प्रकार वक्ता के समीपवर्ती जन वाणी को तत्काल सुन और समझ लेते हैं, उसी प्रकार यह परमात्मा संसार में स्थित, सब के पोषण का इच्छुक एवं वैश्वानर के रूप में सब का पोषक है."

मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं

मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं.

वे हमें सुख प्रदान करें

नक्षत्रों को पराजित कर के प्रकट होने वाले, संसार में सब से प्रथम उत्पन्न एवं वायु के समान शीघ्रगामी सूर्य बादलों को गर्जन करने के लिए प्रेरित करते हुए वर्षा के साथ आते हैं. वे सूर्य त्रिदोष से उत्पन्न रोग आदि का विनाश करते हुए हमारी रक्षा करें. सीधे चलने वाले जो सूर्य एक हो कर भी अपने तेज को तीन प्रकार से प्रकाशित करते हैं, वे हमें सुख प्रदान करें.

उन्हें भी हम अपने मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं

हम से संबंधित जो स्त्री हरिण के समान पैरों वाली, बैल के समान दांतों वाली, गाय के समान गति वाली एवं विकृत शब्द बोलने वाली है; हम मंत्रों के प्रभाव से उस के इन दुर्लक्षणों को दूर करते हैं. जिस स्त्री के माथे पर दुर्लक्षणों के प्रतीक उलटे रोम हैं, उन्हें भी हम अपने मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं.

तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो

हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि ! तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि ! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ.

उसी जल के कारण सभी वृक्ष एवं लताएं जीवित रहती हैं

हे जानने के इच्छुक जनो! इस बात को जानो कि वह जल रूप ब्रह्म पृथ्वी पर नहीं रहता और न वह आकाश में निवास करता है. उसी जल के कारण सभी वृक्ष एवं लताएं जीवित रहती हैं.

क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं

आकाश में स्थित, यज्ञ करने योग्य, सूर्य के समान वर्ण वाले एवं देव संबंधी क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं. वे पृथ्वी आदि लोकों के स्वामी, एकमात्र नमस्कार करने योग्य एवं शोभन सुख देने वाले हैं.

सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं

यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. में इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं.

आप की कृपा से हमारे घर में संपत्ति निवास करे

हे देवो! आप सब को त्याग कर मेरे इस यज्ञ में पधारें. इस में आज्य आदि का होम है. हे स्तुतियों द्वारा बढ़ाए जाते हुए देवो! आप इस यजमान की वृद्धि करें. हे देवो! हमारी स्तुतियों को सुन कर प्रसन्न हुए आप की कृपा से हमारे घर में गाय, अश्व आदि पशु एवं अन्य संपत्ति निवास करे.

हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे

घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे.

जो आयुध हमारे ऊपर चलाया जाता है, उसे हम से दूर करो

हे वरुण! हमारे समीपवर्ती शत्रु द्वारा चलाया हुआ जो आयुध हम तक आता है अथवा दूरवर्ती शत्रु का जो आयुध हमारे ऊपर चलाया जाता है, उसे हम से दूर करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग आदि के कारण असफल न होने वाले शस्त्रास्त्रों से हमें दूर रखो.

तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो

हे अग्नि ! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों

आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों. संपत्ति देने वाले सविता देव हमारे मित्र हों. सविता देव अनेक प्रकार के धनों के स्वामी हैं. वे तथा इंद्र देव हमारे मित्र हैं.

जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है

जिस प्रकार गंधों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं जानते.

अभीवर्त मणि राष्ट्र की समृद्धि के लिए मेरे हाथ में बांधो

शत्रुओं की पराजय करने वाली एवं राक्षसों का विनाश करने वाली अभीवर्त मणि राष्ट्र की समृद्धि और शत्रुओं के विनाश के लिए मेरे हाथ में बांधो.

वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो

हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र ! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो.

चिकित्सा करने वाले सौ वैद्य हैं और हजार जड़ीबूटियां हैं

ब्रह्म ग्रह से छूटा हुआ यह पुरुष पूर्व में अध्ययन किए गए वेद आदि शास्त्रों को स्मरण करे तथा जीवों के आवास स्थानों को जाने, क्योंकि ग्रह से गृहीत इस पुरुष की चिकित्सा करने वाले सौ वैद्य हैं और हजार जड़ीबूटियां हैं.

ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें

द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने क्रोधित हो कर जो शाप दिया है - ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें.

गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें

द्युलोक से संबंधित प्राची आदि चार दिशाओं एवं भूलोक की आग्नेयी आदि चार दिशाओं ने एवं इन दिशाओं के अधिष्ठाता इंद्र आदि देवों ने पहले गर्भ को पूर्ण किया था. वे सभी देव इस समय गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें.

शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे

हम सैकड़ों सामर्थों वाले एवं बाण के पिता पर्जन्य अर्थात् बादल को जानते हैं. हे मूत्ररोगी! मैं तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे.

पीले रंग को गोपीतनक नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं

हे रोगी पुरुष! हम तेरे शरीर में रहने वाले रोग से उत्पन्न हरे रंग को स्रोतों में तथा रोपणक नामक पक्षियों में स्थापित करते हैं. हम तेरे हलदी के समान पीले रंग को गोपीतनक नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं.

चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें

मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.