चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें

मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें.

हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे

घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे.

जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं

तेजस्वी एवं बंधन से छुड़ाने वाले तारे उदित हों. वे तारे पुत्र, पौत्र आदि के शरीर में होने वाले यक्ष्मा, कुष्ठ आदि रोगों एवं उन के फंदों से हमें छुड़ाएं जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं.

तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ

हे इंद्र ! निचोड़ा गया सोमरस तुम्हारे उदर में प्रवेश करे. तुम इस से अपनी दोनों कोखों को भर लो. तुम हमारा आह्वान सुन कर यहां आओ तथा हमारी स्तुतियां सुनो एवं उन्हें स्वीकार करो. हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में अपने मित्र मरुत् आदि देवों के साथ सोमरस पी कर तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ.

मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष ! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी बनें.

पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे

हम सैकड़ों सामथ्यर्थों वाले एवं बाण के पिता मित्र अर्थात् सूर्य को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! इसी बाण से मैं तेरे मूत्रादि रोगों को नष्ट करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे.

रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ

हे पथरी रोग उत्पन करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें

हे अग्नि ! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो.

द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं

हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं.

दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर

हे नील नामक ओषधि ! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर.

तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो

हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं.

शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए

जो मूत्र तेरी आंतों में, मूत्रनाड़ी में एवं मूत्राशय में रुका हुआ है, वह तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए.

ज्वर आदि रोग निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं

हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं.

हम मंत्र रूपी वाणी से बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं

हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें.

शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे

जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे.

निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें

विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें.

सूर्य के दर्शन करने के लिए मेरे शरीर को पुष्ट करो

हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समयतक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो.

इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया

शत्रु विनाशक एवं समस्त प्राणियों के मित्र इंद्र ने वृत्र राक्षस को आसुरी प्रजाओं के समान मार डाला. जिस प्रकार यज्ञ करते हुए अंगिरा गोत्रीय भृगुओं के यज्ञ का आधार गौ का हरण करने वाले बल नामक असुर को मार डाला था, उसी प्रकार इंद्र ने वृत्र का हनन किया. इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया.

हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं

हम दीर्घ जीवन के लिए तथा महान् रमणीय कर्म के लिए राक्षस, पिशाच आदि को भगाने वाली इस मणि को धारण करते हैं, जो वाराणसी में प्रसिद्ध जंगिड़ वृक्ष से बनती है. इस के कारण हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं.

शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो

हे अग्नि ! हम ब्राह्मण तुम्हारी आराधना करते हैं. तुम हमारे प्रमादों को शांत करते हुए अथवा छिपाते हुए वर्तमान रहो. हे अग्नि! शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो. तुम प्रमाद न करते हुए अपने घर में जागृत रहो.

ऊपर तैरने वाली काई के समान नीचे गिर जाए

हे प्रसव करने वाली नाड़ी! तू इस उदरगत जरायु से पुष्ट नहीं होगी, क्योंकि इस का संबंध मांस, मज्जा आदि से नहीं है. इसलिए उजले रंग की यह जरायु दोनों के ऊपर तैरने वाली काई के समान नीचे गिर जाए. इसे कुत्ते के खाने के लिए नीचे गिर जाने दें.

वेदशास्त्र धारण करने की मुझे बुद्धि दीजिए

हे वाणी के स्वामी ब्रह्म देव! आप दिव्य मन के साथ मेरे समीप आइए. हे प्राण के स्वामी ब्रह्म! इच्छित फल दे कर मुझे आनंदित कीजिए. मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेदशास्त्र धारण करने की मुझे बुद्धि दीजिए.

आप सूर्य के समान तेज वाले हैं, आप हमारा विस्तार से कल्याण करें

हे सूर्य द्वारा पृथ्वी से सोखे हुए जल को न गिराने वाले पर्जन्य देव! हे सात गणों वाले मरुत् देव! आप सब सूर्य के समान तेज वाले हैं. आप सब हमारा विस्तार से कल्याण करें.

शत्रु सैनिकों का मन कुछ सोचने और निश्चय करने में समर्थ न हो

शिव के धनुष पिनाक के समान शत्रुओं के मारने में सक्षम आयुध धारण करती हुई, खड्ग आदि आयुधों से शत्रुओं को फाड़ती हुई हमारी सेना मारकाट मचाती हुई आगे बढ़े. यदि शत्रु सेना उस का सामना करने के लिए एकत्र हो, तो शत्रु सैनिकों का मन कुछ सोचने और निश्चय करने में समर्थ न हो. ऐसी स्थिति में हमारे शत्रु राष्ट्र, कोश आदि से रहित हो जाएं.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.