शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें

सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्थमा देव हमारे हाथों और पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, ‘भय मत करो’, कहती हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है.

शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें

हाथी, घोड़े और रथों से युक्त बहुत से शत्रु सैनिक हमें जीतने में असमर्थ हो कर हार जाएं. अल्प संख्या वाले शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें, बांस की ऊपरी शाखाएं जिस प्रकार दुर्बल होती हैं, हम से पराजित हो कर धनहीन बने शत्रु उसी प्रकार समृद्धि रहित हो जाएं.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो

हे ओषधि ! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि ! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे.

मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे

हे सुशोभित सोम ! यह स्त्री पतिव्रता होने के कारण आप के कुल का पालन करने वाली है, इसलिए हम इसे रक्षा के लिए आप को देते हैं. यह तब तक अपने पिता के घर पर रहे. यह धरती पर सिर गिरने तक अर्थात् मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे.

स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं

हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं.

इस ने पहले आप को स्वीकार किया है

हे सुशोभित सोम ! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे.

अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें

सब से पहले अग्नि देव राक्षसों को दंड देना आरंभ करें. इस के पश्चात शक्तिशाली भुजाओं वाले इंद्र राक्षसों को दूर भगाएं. अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें और अपना परिचय दें कि मैं अमुक हूं.

सूर्य के दर्शन करने के लिए मेरे शरीर को पुष्ट करो

हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समयतक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो.

बादल और पृथ्वी दोनों से बाण अर्थात् शक्ति की उत्पत्ति होती है

जड़ चेतन सब का पोषण कर्ता एवं सब को धारण करने वाला बादल बाण का पिता है तथा सभी तत्त्वों से युक्त पृथ्वी इस बाण की माता है. तात्पर्य यह है कि बादल और पृथ्वी दोनों से बाण अर्थात् शक्ति की उत्पत्ति होती है. यह बात हम जानते हैं.

बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं

स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं.

नदियां हमारे अनुकूल बहें एवं पक्षी हमारी इच्छा के अनुसार गति करे

नदियां हमारे अनुकूल बहें, पवन हमारे अनुकूल चले एवं पक्षी हमारी इच्छा के अनुसार (गति करे). पुरातन देव मेरे इस यज्ञ को स्वीकार करें, क्योंकि में घी, दूध आदि का संग्रह कर के यह यज्ञ कर रहा हूं.

राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें समाप्त कर दो

हे सोमरस पीने वाले अग्नि देव! तुम राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें समाप्त कर दो और हमारी संतान की रक्षा करो. हमारे जो शत्रु तुम से भयभीत हो कर तुम्हारी प्रार्थना करते हैं, तुम उन की दाईं और बाईं दोनों आंखें बाहर निकाल लो.

उन तत्त्वों और पदार्थों की दिव्य शक्ति मुझे दें

जो रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण तीन गुण और पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, तन्मात्रा एवं अहंकार सात पदार्थ दिव्य रूप में सर्वत्र भ्रमण करते हैं, वाणी के स्वामी ब्रह्म उन तत्त्वों और पदार्थों की दिव्य शक्ति मुझे दें.

देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं

पूर्व आदि दिशाओं की रक्षा करने वाले एवं कभी न मरने वाले इंद्र, यम आदि चार देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं. वे देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं.

आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें

हे जल! आप सभी प्रकार का सुख देने वाले हैं. अन्न आदि सुखों का उपभोग करने के इच्छुक हम सब को आप उन के उपभोग की शक्ति प्रदान करें. आप हमें महान एवं रमणीय आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें.

घृत का भोजन कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए

हे स्वर्ग आदि उत्तम स्थानों में निवास करने वाले, हे जातवेद एवं हे जलशक्ति रूप में सब के शरीरों में स्थित जग्नि! हमारे द्वारा खुवा आदि से नाप कर दिए गए घृत का भोजन कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए.

सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की

बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने अपना शत्रुघातक वज्ज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की.

यह सीसा राक्षसों का संहार करने वाला है

वरुण देव ने फेन के विषय में कहा है. सीसे जस्ते के विषय में अग्नि ने भी यही कहा है. परम ऐश्वर्ययुक्त इंद्र ने मुझे सीसा प्रदान किया है. इंद्र ने कहा है कि हे प्रिय! यह सीसा राक्षसों का संहार करने वाला है.

रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ

हे पथरी रोग उत्पन करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ.

प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से मेरी रक्षा करें

जो हमारी जाति का अथवा भिन्न जाति का पुरुष हम से द्वेष रखने के कारण हमें शाप देता है, इंद्र आदि सभी देव उस का विनाश करें, मेरे द्वारा प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से मेरी रक्षा करें.

राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ

हे अग्नि ! तुम रस्सी आदि से राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ. इस के पश्चात इंद्र अपने वज्र से उन के सिर काट दें.

प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र ! तुम हम पर प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो. हे शूर इंद्र! अपने घोड़ों की सहायता से तुम मेरे यज्ञ में आओ तथा इस यज्ञ में निचोड़े गए सोमरस को पियो. यह सोमरस प्रशंसनीय एवं मधुर है. पीने पर यह सोमरस तृप्ति और उत्तम मादकता का कारण बनता है.

उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो

हे बृहस्पति आदि देवो! आप की स्तुति करता हुआ जो यह मनुष्य आप की शरण में आया है, यह हमारा विरोधी शत्रु है. हे बृहस्पति, अग्नि एवं सोम ! इन उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो.

समस्त कार्यों के द्वारा मधु के समान बन कर सब के प्रेम का पात्र बनूं

हे मधु लता ! तुम्हें धारण करने से मेरा निकट गमन दूसरों को प्रसन्न करने वाला हो तथा मेरा दूर गमन दूसरों को प्रसन्न करे. में वाणी से मधुयुक्त हो कर तथा समस्त कार्यों के द्वारा मधु के समान बन कर सब के प्रेम का पात्र बनूं.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.