प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से मेरी रक्षा करें

जो हमारी जाति का अथवा भिन्न जाति का पुरुष हम से द्वेष रखने के कारण हमें शाप देता है, इंद्र आदि सभी देव उस का विनाश करें, मेरे द्वारा प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से मेरी रक्षा करें.

प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र ! तुम हम पर प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो. हे शूर इंद्र! अपने घोड़ों की सहायता से तुम मेरे यज्ञ में आओ तथा इस यज्ञ में निचोड़े गए सोमरस को पियो. यह सोमरस प्रशंसनीय एवं मधुर है. पीने पर यह सोमरस तृप्ति और उत्तम मादकता का कारण बनता है.

मनुष्य निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें

हे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें.

वह प्राणियों के मध्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है

स्वर्ण बंधे हुए इस पुरुष को राक्षस और पिशाच पराजित नहीं कर सकते, क्योंकि यह देवों का प्रथम उत्पन्न हुआ ओज है. दक्ष पुत्रों से संबंधित इस स्वर्ण को जो बांधता है, वह प्राणियों के मध्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है.

रोग समाप्त करो एवं बहुत से रोगों का विनाश करो

हे ओषधि ! प्रयोग के तुरंत बाद रोग समाप्त करो एवं बहुत से रोगों का विनाश करो. तुम से संबंधित अनगिनत जड़ीबूटियां हैं, उन में तुम उत्तम हो. तुम अतिसार आदि रोग दूर करने वाली एवं इन के मूल कारणों का विनाश करने वाली हो.

पर्याप्त रूप में आ कर हमें तृप्त करें

हे जल! हम जिस अन्न आदि को पा कर तृप्त होते हैं, उसे प्राप्त करने के लिए हम आप को पर्याप्त रूप में पाएं. हे जल! आप पर्याप्त रूप में आ कर हमें तृप्त करें.

पीले रंग को गोपीतनक नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं

हे रोगी पुरुष! हम तेरे शरीर में रहने वाले रोग से उत्पन्न हरे रंग को स्रोतों में तथा रोपणक नामक पक्षियों में स्थापित करते हैं. हम तेरे हलदी के समान पीले रंग को गोपीतनक नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं.

तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो

हे अग्नि ! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो.

तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ

हे इंद्र ! निचोड़ा गया सोमरस तुम्हारे उदर में प्रवेश करे. तुम इस से अपनी दोनों कोखों को भर लो. तुम हमारा आह्वान सुन कर यहां आओ तथा हमारी स्तुतियां सुनो एवं उन्हें स्वीकार करो. हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में अपने मित्र मरुत् आदि देवों के साथ सोमरस पी कर तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ.

मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है

आकाश मंडल में दिखाई देने वाले एवं सभी प्राणियों के प्रेरक सूर्य देव उदित हो गए हैं. अपनी विजय की एवं शत्रुओं की पराजय की कामना करने वाली मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है. अभीवर्त मणि को धारण करने वाला में जिस प्रकार शत्रुओं को मारने वाला बनूं, ऐसा सुयोग उपस्थित हो. में शत्रुरहित हो जाऊं, यदि मेरा कोई शत्रु हो भी तो उसे में पराजित करूं.

हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए. जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो.

मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें

हे अग्नि ! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो.

जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो

दिव्यगुणों वाला जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो. जल हमारे चारों और कल्याण की वर्षा करे एवं पीने के लिए उपलब्ध हो.

शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके

आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुथ हमारी ओर आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके.

मुंजवान पर्वत से उतर कर मूंज उत्तम जड़ीबूटी है

मुंजवान पर्वत से उतर कर जो मूंज धरती पर वर्तमान है, हे मूंज! तेरे उस अग्रभाग से मैं ओषधि बनाता हूं, क्योंकि तू उत्तम जड़ीबूटी है.

आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता

हे इंद्र! आप शासक और नियंता होने के कारण महान गुणों से युक्त हैं. आप शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं. आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता. शत्रु कभी भी उस का अपमान नहीं कर पाते.

ज्वर आदि रोग निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं

हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं.

तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो

हे ओषधि ! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि ! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे.

जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है

दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने इस विश्व को व्यक्त किया, उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस की स्तुति करती हैं.

दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर

हे नील नामक ओषधि ! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर.

मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं

मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं.

हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं

हम दीर्घ जीवन के लिए तथा महान् रमणीय कर्म के लिए राक्षस, पिशाच आदि को भगाने वाली इस मणि को धारण करते हैं, जो वाराणसी में प्रसिद्ध जंगिड़ वृक्ष से बनती है. इस के कारण हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं.

हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें

जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें.

सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की

बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने अपना शत्रुघातक वज्ज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की.

शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे

जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.