वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो

हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र ! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो.

यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए, समस्त रोगों की ओषधि है

जंगिड़ वृक्ष से निर्मित यह मणि दूसरों को पराजित करती है, कृत्या आदि भक्षकों को नष्ट करती है तथा समस्त रोगों की ओषधि है. यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए.

रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए

हे रोग ग्रसित पुरुष! तेरे हृदय को संताप पहुंचाने वाला हृदय रोग एवं कामला आदि रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए. हे रोगी! गाय के लाल वर्ण से पहचाने जाने वाले के रूप में में तुझे स्वस्थ कराता हूं.

उसी प्रकार तू जरायु के साथ गर्भ से बाहर आ

हे दशमास गर्भस्थ शिशु ! जिस प्रकार वायु, मन एवं आकाश में उड़ने वाले पक्षी आकाश में बिना रोकटोक के विचरण करते हैं, उसी प्रकार तू जरायु के साथ गर्भ से बाहर आ. जरायु गर्भाशय से नीचे गिरे.

तुम अंतरिक्ष के केंद्र सागर में स्थित हो

हे ऊंचाई से नीचे की ओर गिरने वाले पर्जन्य! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम्हारे संतापकारी आयुध वज्र को नमस्कार है. हम आप के गुफा के समान अगम्य एवं उत्तम निवास स्थान को जानते हैं. जिस प्रकार शरीर में नाभि मध्यस्थ है, उसी प्रकार तुम अंतरिक्ष के केंद्र सागर में स्थित हो.

अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें

सब से पहले अग्नि देव राक्षसों को दंड देना आरंभ करें. इस के पश्चात शक्तिशाली भुजाओं वाले इंद्र राक्षसों को दूर भगाएं. अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें और अपना परिचय दें कि मैं अमुक हूं.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

जलों में ओषधियां निवास करती हैं

जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें.

जल हमारे लिए सुखकारी हो, कल्याणकारी हों

जल हमें मरु भूमि में सुखकारी हों. जिन स्थानों में जल की प्राप्ति सुलभ है, वहां के जल हमारा कल्याण करें. कुआं, बावड़ी आदि खोद कर प्राप्त किए गए जल हमारे लिए कल्याणकारी हों. घड़े में भर कर लाया गया जल हमें सुख दे. वर्षा से प्राप्त होने वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो.

देवी एवं मानवीय अस्त्रशस्त्र हैं, वे जा कर हमारे शत्रुओं को वेध डालें

जो बाण शत्रुओं द्वारा धनुष से छोड़े जा रहे हैं अथवा जो बाण छोड़ने के लिए तरकस में सुरक्षित हैं, वे हम से दूर रहें. जो देवी एवं मानवीय अस्त्रशस्त्र हैं, वे जा कर हमारे शत्रुओं को वेध डालें.

उन्नति के मार्ग में विघ्न डालने वाले पाप भी हमें न पा सकें

हे सोम देव! हमारा शत्रु अपने स्थान से भागा हुआ होने के कारण कभी भी अपनी स्त्री के पास न पहुंच सके. हे मरुत् देव! इस यज्ञ में आप हमारी रक्षा करें, सामने से आता हुआ तेजस्वी शत्रु मुझे प्राप्त न कर सके, कीर्ति और उन्नति के मार्ग में विघ्न डालने वाले पाप भी हमें न पा सकें.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वह रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है

बांमी बनाने वाली दीमक पृथ्वी के नीचे स्थित जलराशि से रोग निवारक जड़ीबूटी को उखाड़ती है. वह अतिसार आदि रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है.

इस ने पहले आप को स्वीकार किया है

हे सुशोभित सोम ! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे.

शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ

हे ब्रह्मणस्पति! समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करने वाली जिस मणि को धारण कर के इंद्र उन्मत्त हुए हैं, उसी मणि के द्वारा शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ. आप की कृपा से हम संपन्न जनों द्वारा सुरक्षित राष्ट्र में शत्रुओं के भय से रहित हों.

क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं

आकाश में स्थित, यज्ञ करने योग्य, सूर्य के समान वर्ण वाले एवं देव संबंधी क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं. वे पृथ्वी आदि लोकों के स्वामी, एकमात्र नमस्कार करने योग्य एवं शोभन सुख देने वाले हैं.

दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर

हे नील नामक ओषधि ! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर.

कोई भी इस की हिंसा करने में समर्थ न हो

हे विश्वे देव! वसु एवं आदित्य देवो! दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष की रक्षा करो एवं दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष के विषय में सावधान रहो. इस का सजातीय अथवा विजातीय शत्रु इस के पास तक न आ सके. कोई भी इस की हिंसा करने में समर्थ न हो.

शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके

आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुथ हमारी ओर आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके.

हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे

घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे.

जल हमारे लिए रोग नाशक और सुखकारक हों

सोने के रंग की शुद्ध अग्नियां एवं सविता जिन जलों से उत्पन्न हुए हैं, बादलों में स्थित जिन जलों में विद्युत रूपी अग्नि तथा सागर में स्थित जिन जलों में वाडवाग्नि उत्पन्न हुई है, जिन शोभन रंग वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग नाशक और सुखकारक हों.

जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो

हे हरिद्रा ! हलदी नामक ओषधि! तू रात में उत्पन्न हुई है. इसलिए तू शरीर की सफेदी दूर करने में समर्थ है. हे भृंगराज (भागरा) नामक ओषधि ! रंग काला कर देने वाली इंद्रावारुणि नामक ओषधि ! एवं असित वर्ण करने वाली नील नामक ओषधि ! तुम कुष्ठ रोग के कारण विकृत रंग वाले इस अंग को अपने रंग में रंग दो. वृद्धावस्था के कारण जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो.

हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष, तुझे संपन्नता की अनुमति दें

हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष! मैं तुझे संवत्सरों की, महीनों की, ऋतुओं की एवं काल संबंधी दूध की धार से पूर्ण करता हूं. इंद्र और अग्नि तथा समस्त देव क्रोध न करते हुए तुझे संपन्नता की अनुमति दें.

राक्षस अपना परिचय देते हुए हमारी शरण में आएं

हे सब को जानने वाले अग्नि! हम आप का पराक्रम देखें. हे उपासना के योग्य अग्नि ! हमारी इच्छानुसार राक्षसों से कहिए कि वे हमें दुःख न दें. आप के द्वारा सताए हुए राक्षस अपना परिचय देते हुए हमारी शरण में आएं.

जो सौभाग्य सूचक चिह्न हैं, वे हमारी संतान को प्राप्त हों

हम ललाट के असौभाग्य सूचक चिह्न को शत्रु के समान अपने शरीर से दूर करते हैं. जो सौभाग्य सूचक चिह्न हैं, वे हमारी संतान को प्राप्त हों. हम ने अपने शरीर से बुरे चिह्न दूर किए हैं, वे हमारे शत्रुओं को प्राप्त हों.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.