उन्हें नष्ट करने के लिए उन के समीप चलें

राक्षसों के विनाशक और रोगों को दूर करने वाले अग्नि देव उन्हें नष्ट करने के लिए उन के समीप चलें. अग्नि देव मायामय, सौम्य, हिंसक एवं भयावह रूप धारण करने वाले, दूसरों के दोष खोजने वाले, पीड़ादायक एवं परेशान करने वाले राक्षसों को भस्म करते हुए इस पुरुष के समीप आ रहे हैं.

माता और पुत्र को अलग-अलग करता हूं

हे गर्भिणी! मैं गर्भस्थ बालक को बाहर निकालने के लिए मूत्रमार्ग को फैलाता हूं तथा योनि के आसपास की नाड़ियों को भी फैलाता हूं. क्योंकि ये प्रसव में बाधा डालती हैं. में माता और पुत्र को अलग-अलग करता हूं. इस के बाद में पुत्र को जरायु से अलग करता हूं. जरायु गर्भाशय से नीचे गिर जाए.

हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें

जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें.

मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है

आकाश मंडल में दिखाई देने वाले एवं सभी प्राणियों के प्रेरक सूर्य देव उदित हो गए हैं. अपनी विजय की एवं शत्रुओं की पराजय की कामना करने वाली मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है. अभीवर्त मणि को धारण करने वाला में जिस प्रकार शत्रुओं को मारने वाला बनूं, ऐसा सुयोग उपस्थित हो. में शत्रुरहित हो जाऊं, यदि मेरा कोई शत्रु हो भी तो उसे में पराजित करूं.

वह रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है

बांमी बनाने वाली दीमक पृथ्वी के नीचे स्थित जलराशि से रोग निवारक जड़ीबूटी को उखाड़ती है. वह अतिसार आदि रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है.

रोगों का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे

हे रोगी! तेरे रोग को शांत करने के लिए में बैल जुते हुए हलों को एवं हरण तथा जुए को नमस्कार करता हूं. क्षेत्रीय व्याधियों अर्थात् अतिसार, यक्ष्मा आदि रोगों का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे.

जलों में ओषधियां निवास करती हैं

जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें.

मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष ! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी बनें.

मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें

हे अग्नि ! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो.

राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें समाप्त कर दो

हे सोमरस पीने वाले अग्नि देव! तुम राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें समाप्त कर दो और हमारी संतान की रक्षा करो. हमारे जो शत्रु तुम से भयभीत हो कर तुम्हारी प्रार्थना करते हैं, तुम उन की दाईं और बाईं दोनों आंखें बाहर निकाल लो.

तुम राक्षसों के विनाश का कार्य आरंभ करो

हे सब को जानने वाले अग्नि ! तुम राक्षसों के विनाश का कार्य आरंभ करो, क्योंकि तुम हमारे प्रयोजन पूर्ण करने के लिए उत्पन्न हुए हो. हे अग्नि ! तुम हमारे दूत बन कर राक्षसों को दूर भगाओ.

उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है

हे जीवन को कष्ट पूर्ण बनाने वाले ज्वर! जिस अग्नि ने प्रवेश कर के जलों को जलाया अर्थात् गरम किया, यश, दान आदि धार्मिक कृत्य करने वालों ने जिस अग्नि में होम किया है, उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है. यह सब जानता हुआ तू गरम जल से स्नान करने वाले हमारे शरीर को त्याग कर अग्नि में प्रवेश कर.

पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीमित पाप से बचाओ

हे मणि! हमें स्वर्ग की जड़ के समान विस्तृत एवं पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीमित पाप से बचाओ और सभी प्रकार से हमारी रक्षा करो.

मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं

मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं.

उन तत्त्वों और पदार्थों की दिव्य शक्ति मुझे दें

जो रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण तीन गुण और पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, तन्मात्रा एवं अहंकार सात पदार्थ दिव्य रूप में सर्वत्र भ्रमण करते हैं, वाणी के स्वामी ब्रह्म उन तत्त्वों और पदार्थों की दिव्य शक्ति मुझे दें.

ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों

वाणी के स्वामी ब्रह्म का हम आह्वान करते हैं. हमारे द्वारा आह्वान किए गए ब्रह्म हमें अपने समीप बुलाएं. हम संपूर्ण ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों.

चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें

मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें.

रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए

हे व्याधिग्रस्त पुरुष! तेरी दीर्घायु के लिए हम तुझे गाय के समान लाल रंग से ढकते हैं. यह पुरुष पापरहित हो कर कामला आदि रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए.

अपने घूमनेफिरने के प्रदेश में पराजित करते हैं

अग्नि आदि देवों के द्वारा दी हुई एवं सुख देने वाली जंगिड़ मणि से हम विघ्न करने वाले सभी राक्षसों को अपने घूमनेफिरने के प्रदेश में पराजित करते हैं.

मैं स्वच्छ एवं देवता रूप जलों का आह्वान करता हूं

मैं स्वच्छ एवं देवता रूप जलों का आह्वान करता हूं. जल से पूर्ण जलाशयों अर्थात् नदियों और तालाबों में हमारी गाएं जल पीती हैं.

ऊपर तैरने वाली काई के समान नीचे गिर जाए

हे प्रसव करने वाली नाड़ी! तू इस उदरगत जरायु से पुष्ट नहीं होगी, क्योंकि इस का संबंध मांस, मज्जा आदि से नहीं है. इसलिए उजले रंग की यह जरायु दोनों के ऊपर तैरने वाली काई के समान नीचे गिर जाए. इसे कुत्ते के खाने के लिए नीचे गिर जाने दें.

रोग पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं

हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं.

यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है

घाव को पकाने वाली यह जड़ीबूटी अर्थात् मिट्टी खेत से खोद कर लाई गई है. यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है.

अभीवर्त मणि राष्ट्र की समृद्धि के लिए मेरे हाथ में बांधो

शत्रुओं की पराजय करने वाली एवं राक्षसों का विनाश करने वाली अभीवर्त मणि राष्ट्र की समृद्धि और शत्रुओं के विनाश के लिए मेरे हाथ में बांधो.

हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें

हमारी माता, हमारे पिता, हमारी गायों और सारे संसार का कल्याण हो. हमारी माता आदि उत्तम धन एवं श्रेष्ठ ज्ञान वाले हैं. हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.