उन के सामने डट कर तुम उन को पराजित करो

हे अभीवर्त मणि! तुम हमारे शत्रुओं के सामने डट कर उन्हें पराजित करो. जो हमारे राष्ट्र, धन आदि का अपहरण कर के हमारे प्रति शत्रुता का व्यवहार करते हैं, उन के सामने डट कर तुम उन को पराजित करो. जो हम से युद्ध करने के लिए सेना सजाते हैं अथवा हमारे प्रति अभिचार (जादूटोने) के रूप में शत्रुता करते हैं, तुम उन्हें भी पराजित करो.

धन प्रदान करें तथा देव इसे उत्तम ज्योति संपन्न बनाएं

भांतिभांति की धन संपत्ति की कामना करने वाले इस पुरुष को वसु, इंद्र, पूषा, वरुण, मित्र, अग्नि एवं विश्वे देव धन प्रदान करें तथा ये देव इसे उत्तम ज्योति संपन्न बनाएं.

हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें

जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें.

जल अमृत को टपकाने वाले तथा पवित्र करने वाले हैं

हे जल के अभिमानी देव! मुझे सुखकर दृष्टि से देखो तथा अपने कल्याणकारी शरीर से मेरी देह का स्पर्श करो. जो जल अमृत को टपकाने वाले तथा पवित्र करने वाले हैं, वे हमारे लिए रोग विनाशक और सुखकारी हों.

रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ

हे पथरी रोग उत्पन करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ.

शरीरों को सुख दें एवं हमारी संतान को सुखी बनाएं

हे इंद्र आदि देवो! आप शत्रुओं द्वारा छोड़े जाने वाले आयुधों को हम से दूर करो तथा हमें सुख दो. हे इंद्र आदि देवो! आप हमारे शरीरों को सुख दें एवं हमारी संतान को सुखी बनाएं.

शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ

हे ब्रह्मणस्पति! समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करने वाली जिस मणि को धारण कर के इंद्र उन्मत्त हुए हैं, उसी मणि के द्वारा शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ. आप की कृपा से हम संपन्न जनों द्वारा सुरक्षित राष्ट्र में शत्रुओं के भय से रहित हों.

हमारे शरीर से बाहर निकल जाओ

हे शीत ज्वर! तुम शरीर को शोकाकुल करने वाले, शरीर को सभी प्रकार से सुखाने वाले एवं तेजस्वी वरुण के पुत्र हो. तुम हूढ़ नाम से प्रसिद्ध हो. तुम हमारे गरम जल से भीगे हुए शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जाओ.

शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो

हे अग्नि ! हम ब्राह्मण तुम्हारी आराधना करते हैं. तुम हमारे प्रमादों को शांत करते हुए अथवा छिपाते हुए वर्तमान रहो. हे अग्नि! शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो. तुम प्रमाद न करते हुए अपने घर में जागृत रहो.

ज्वर आदि रोग निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं

हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं.

हे दिव्य किरणो, मैं तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूं

हे आकाश में जन्म लेने वाली, प्रकाशयुक्त एवं नक्षत्र रूपिणी किरणो! तुम में से जो विश्वावसु गंधर्व अर्थात् चंद्रमा के साथ संयुक्त होती हैं, हे दिव्य किरणो! मैं तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूं.

जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है

जिस प्रकार गंधों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं जानते.

शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें

सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्थमा देव हमारे हाथों और पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, 'भय मत करो', कहती हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है.

वेदशास्त्र धारण करने की शक्ति एवं आनंदोपभोग के इच्छित साधन प्रदान करो

हे वाणी के स्वामी ब्रह्म! जिस प्रकार धनुष की डोरी चढ़ाने से उस के दोनों सिरे समान रूप से खिंच जाते हैं, उसी प्रकार मुझे वेदशास्त्र धारण करने की शक्ति एवं आनंदोपभोग के इच्छित साधन प्रदान करो.

उन्हें भी हम अपने मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं

हम से संबंधित जो स्त्री हरिण के समान पैरों वाली, बैल के समान दांतों वाली, गाय के समान गति वाली एवं विकृत शब्द बोलने वाली है; हम मंत्रों के प्रभाव से उस के इन दुर्लक्षणों को दूर करते हैं. जिस स्त्री के माथे पर दुर्लक्षणों के प्रतीक उलटे रोम हैं, उन्हें भी हम अपने मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं.

सभी प्राणियों को वश में रखने वाले

विनाश रहित, क्षोभ न देने वाले, सभी प्रजाओं के पालनकर्ता, वृत्र नामक राक्षस अथवा जल के आधार मेघ को नष्ट करने वाले, शत्रुओं की विशेष रूप से हिंसा करने वाले, सभी प्राणियों को वश में रखने वाले, मनोकामनाओं की वर्षा करने वाले एवं सोमरस को पीने वाले इंद्र देव हमारे लिए अभय करने वाले बन कर संग्राम में हमारे नेता बनें.

धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है

जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है, वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले.

वेदशास्त्र धारण करने की मुझे बुद्धि दीजिए

हे वाणी के स्वामी ब्रह्म देव! आप दिव्य मन के साथ मेरे समीप आइए. हे प्राण के स्वामी ब्रह्म! इच्छित फल दे कर मुझे आनंदित कीजिए. मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेदशास्त्र धारण करने की मुझे बुद्धि दीजिए.

इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं

हे अग्नि ! आप और परम ऐश्वर्य वाले इंद्र, हमारे दिए गए हवि को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें. राक्षस, सब का भक्षण करने वाले दस्यु एवं इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं.

इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ

हे अग्नि ! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं इस यजमान की इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ एवं उस के सौभाग्य के हेतु उत्साहित बनो. तुम्हारे सेवक ऋत्विज आदि नष्ट न हों. हे अग्नि ! तुम्हारे ऋत्विज् ब्राह्मण ही यशस्वी हैं, अन्य नहीं.

उदर (पेट) में संचित तेरा मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे

हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता सूर्य को जानते हैं. हे रोगी! मैं इसी बाण से तेरे मूत्रादि रोगों को नष्ट करता हूं. उदर (पेट) में संचित तेरा मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे.

रोग पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं

हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं.

ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों

वाणी के स्वामी ब्रह्म का हम आह्वान करते हैं. हमारे द्वारा आह्वान किए गए ब्रह्म हमें अपने समीप बुलाएं. हम संपूर्ण ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों.

विजय के कारण प्राप्त उस पित्त को ओषधि का रूप दे दिया

हे ओषधि! सब से पहले गरुड़ उत्पन्न हुए. तू उन के शरीर में पित्त दोष के रूप में थी. आसुरी माया ने गरुड़ से युद्ध कर के पित्त को जीत लिया एवं विजय के कारण प्राप्त उस पित्त को ओषधि का रूप दे दिया.

निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें

विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.