तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो

हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं.

वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे

मैं जलों के तेज, ज्योति, ओज और बल तथा वनस्पतियों का वीर्य उसी प्रकार धारण करता हूं, जिस प्रकार इंद्र में इंद्रियों के असाधारण चिह्न वर्तमान हैं. इसीलिए वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे.

जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो

हे हरिद्रा ! हलदी नामक ओषधि! तू रात में उत्पन्न हुई है. इसलिए तू शरीर की सफेदी दूर करने में समर्थ है. हे भृंगराज (भागरा) नामक ओषधि ! रंग काला कर देने वाली इंद्रावारुणि नामक ओषधि ! एवं असित वर्ण करने वाली नील नामक ओषधि ! तुम कुष्ठ रोग के कारण विकृत रंग वाले इस अंग को अपने रंग में रंग दो. वृद्धावस्था के कारण जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो.

अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं

जिस प्रकार माताएं अपनी इच्छा से दूध पिला कर बालकों को पुष्ट करती हैं, उसी प्रकार हे जल! आप अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं.

यह महती ओषधि उस का समूल विनाश करती है

प्राणों का अपहरण करने वाले राक्षस एवं शरीर को निर्बल बनाने वाले रोग विशाल घाव के पकने के स्थान को नीचे से विदीर्ण करते हैं, यह महती ओषधि उस का समूल विनाश करती है तथा अतिसार आदि रोगों को जड़ से मिटा देती है.

चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें

मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो

हे धनुष की निंदनीय डोरी! तुम हमारी ओर न झुक कर हमारे शत्रुओं की ओर झुको. हे देवपति ! हमारे शरीरों को पत्थर के समान सुदृद्ध बनाओ, हमें शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो.

जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है

जिस प्रकार गंधों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं जानते.

आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता

हे इंद्र! आप शासक और नियंता होने के कारण महान गुणों से युक्त हैं. आप शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं. आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता. शत्रु कभी भी उस का अपमान नहीं कर पाते.

तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो

हे अग्नि ! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो.

उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है

हे जीवन को कष्ट पूर्ण बनाने वाले ज्वर! जिस अग्नि ने प्रवेश कर के जलों को जलाया अर्थात् गरम किया, यश, दान आदि धार्मिक कृत्य करने वालों ने जिस अग्नि में होम किया है, उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है. यह सब जानता हुआ तू गरम जल से स्नान करने वाले हमारे शरीर को त्याग कर अग्नि में प्रवेश कर.

मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष ! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी बनें.

यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है

घाव को पकाने वाली यह जड़ीबूटी अर्थात् मिट्टी खेत से खोद कर लाई गई है. यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है.

मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है

आकाश मंडल में दिखाई देने वाले एवं सभी प्राणियों के प्रेरक सूर्य देव उदित हो गए हैं. अपनी विजय की एवं शत्रुओं की पराजय की कामना करने वाली मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है. अभीवर्त मणि को धारण करने वाला में जिस प्रकार शत्रुओं को मारने वाला बनूं, ऐसा सुयोग उपस्थित हो. में शत्रुरहित हो जाऊं, यदि मेरा कोई शत्रु हो भी तो उसे में पराजित करूं.

तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो

हे ओषधि ! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि ! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे.

यंत्र आदि के द्वारा जो पत्थर फेंकते हो, वे भी हम से दूर रहें

हे देवो! आप की कृपा से शत्रु द्वारा प्रयुक्त खड्ग आदि आयुध हमारे शरीर से दूर हो जाएं. हे शत्रुओ! तुम यंत्र आदि के द्वारा जो पत्थर फेंकते हो, वे भी हम से दूर रहें.

उचित-अनुचित कार्य के सोच-विचार से हमें बचाएं

असीमित सामर्थ्य वाली जंगिड़ मणि राक्षस के दांतों द्वारा खाए जाने से, शरीर के खंडखंड हो कर बिखरने से, रोग आदि रूप विघ्नों से, उचित अनुचित कार्य के सोचविचार से एवं जम्हाई आदि सब से हमें बचाएं.

स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं

हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं.

मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं

मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं.

हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ

हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ.

जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्री-पुरुष अपने मनोरथ में असफल होकर मेरी शरण में आएं

मेरे द्वारा अग्नि आदि देवों को दिया हुआ घृत आदि हवि दुष्ट राक्षसों को यहां से उसी प्रकार दूर हटा दे, जिस प्रकार नदी की धारा फेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है. मेरे प्रति अभिचार, जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्रीपुरुष अपने मनोरथ में असफल हो कर यहां मेरी शरण में आएं और मेरी स्तुति करें.

आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों

आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों. संपत्ति देने वाले सविता देव हमारे मित्र हों. सविता देव अनेक प्रकार के धनों के स्वामी हैं. वे तथा इंद्र देव हमारे मित्र हैं.

सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं

यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. में इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं.

शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ

हे ब्रह्मणस्पति! समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करने वाली जिस मणि को धारण कर के इंद्र उन्मत्त हुए हैं, उसी मणि के द्वारा शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ. आप की कृपा से हम संपन्न जनों द्वारा सुरक्षित राष्ट्र में शत्रुओं के भय से रहित हों.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.