तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ

हे मधु लता! तू मेरी जीभ के अग्र भाग पर शहद के समान स्थित हो तथा जीभ की जड़ में मधु रस वाले मधु नामक जल वृक्ष के फूल के रूप में वर्तमान रह. तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ.

पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया

मैं वज्रधारी इंद्र के उन वीरता पूर्ण कार्यों का वर्णन करता हूं जो उन्होंने पूर्व काल में किए हैं. उन्होंने वृत्रासुर का हनन किया तथा उस के बाद उस के द्वारा रोके गए जल को निकाल दिया एवं पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया.

वे इस कार्य में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें

हे धन देने वाले देव कुबेर! मैं अपने अभिमत धन आदि प्राप्त करने के लिए हवि से इंद्र आदि देवों की प्रसन्नता के लिए हवन करता हूं. दिशाओं की रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों में जो चौथे देव कुबेर हैं, वे इस यज्ञ में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें.

आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें

हे जल! आप सभी प्रकार का सुख देने वाले हैं. अन्न आदि सुखों का उपभोग करने के इच्छुक हम सब को आप उन के उपभोग की शक्ति प्रदान करें. आप हमें महान एवं रमणीय आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें.

ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है

ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है, "मैं ने तत्त्व ज्ञान होते ही द्यावा और पृथ्वी को सभी ओर से प्राप्त कर लिया है तथा में ही ब्रह्म से प्रथम उत्पन्न प्राणी एवं भौतिक पदार्थ हूं. जिस प्रकार वक्ता के समीपवर्ती जन वाणी को तत्काल सुन और समझ लेते हैं, उसी प्रकार यह परमात्मा संसार में स्थित, सब के पोषण का इच्छुक एवं वैश्वानर के रूप में सब का पोषक है."

मनुष्यों के सत्य और असत्य को जानते हुए चलते हैं

राजा वरुण जिन जलों के मध्य में स्थित हो कर मनुष्यों के सत्य और असत्य को जानते हुए चलते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों.

हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं

हम दीर्घ जीवन के लिए तथा महान् रमणीय कर्म के लिए राक्षस, पिशाच आदि को भगाने वाली इस मणि को धारण करते हैं, जो वाराणसी में प्रसिद्ध जंगिड़ वृक्ष से बनती है. इस के कारण हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं.

इंद्र का वज्र रोग उत्पन्न करने वाले राक्षसों का विनाश करे

ओषधियों के रूप में प्रयोग किए जाते हुए जल एवं ओषधियां हमारे रोगों को शांत करने वाले हैं. इंद्र का वज्र रोग उत्पन्न करने वाले राक्षसों का विनाश करे. मनुष्यों को पीड़ा पहुंचाने के निमित्त प्रयुक्त राक्षसों के रोग रूपी बाण हम से दूर गिरें अर्थात् रोग हम से दूर रहें.

शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे

हम सैकड़ों सामर्थों वाले एवं बाण के पिता पर्जन्य अर्थात् बादल को जानते हैं. हे मूत्ररोगी! मैं तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे.

इस अंग को अपने समान रंग वाला अर्थात् काला कर दे

हे ओषधि ! तेरी माता तेरे समान ही काले रंग वाली है. तेरा पिता आकाश भी तेरे ही समान नीले रंग का है. हे नील नामक ओषधि ! तू अपने संपर्क में आने वाले पदार्थ को अपने समान रंग वाला बना देती है. इसलिए कुष्ठ रोग से दूषित इस अंग को अपने समान रंग वाला अर्थात् काला कर दे.

सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं

यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. में इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं.

स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं

हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं.

लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हम तुझे ढकते हैं

देवों की जो लाल रंग की कामधेनु आदि गाएं एवं मनुष्यों की जो लाल रंग की गाएं हैं, इन दोनों प्रकार के लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हे रोगी पुरुष! हम तुझे ढकते हैं.

रक्तवाहिनी नाड़ियां इस मंत्र के प्रभाव से खून बहाना बंद कर दें

हृदय संबंधी सैकड़ों धमनियां, हजारों शिराएं एवं उन की मध्यवर्ती रक्तवाहिनी नाड़ियां इस मंत्र के प्रभाव से खून बहाना बंद कर दें. शेष नाड़ियां पूर्ववत रक्त प्रवाह चालू रखें.

उचित-अनुचित कार्य के सोच-विचार से हमें बचाएं

असीमित सामर्थ्य वाली जंगिड़ मणि राक्षस के दांतों द्वारा खाए जाने से, शरीर के खंडखंड हो कर बिखरने से, रोग आदि रूप विघ्नों से, उचित अनुचित कार्य के सोचविचार से एवं जम्हाई आदि सब से हमें बचाएं.

जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं

तेजस्वी एवं बंधन से छुड़ाने वाले तारे उदित हों. वे तारे पुत्र, पौत्र आदि के शरीर में होने वाले यक्ष्मा, कुष्ठ आदि रोगों एवं उन के फंदों से हमें छुड़ाएं जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं.

दीर्घ आयु चाहने वाले पुरुष के समीप बैठने के लिए नियुक्त करता हूं

जिस देव के निमित्त पंचयाग किए जाते हैं, वह अग्नि देव; जिन देवों के निमित्त बाद वाले तीन यज्ञ किए जाते हैं, वह इंद्र आदि देव; जो बलि का अपहरण करते हैं, दिशाओं के स्वामी देव हैं, इन सब को एवं इन के अतिरिक्त जो देव हैं, उन को भी में इस दीर्घ आयु चाहने वाले पुरुष के समीप बैठने के लिए नियुक्त करता हूं.

बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं

स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं.

जिन के द्वार एवं खिड़की रूपी नेत्र खुले हुए हैं

ऐसे सूने घरों को नमस्कार है, जिन के द्वार एवं खिड़की रूपी नेत्र खुले हुए हैं. ऐसे गड्‌ढों के लिए नमस्कार है, जिन की मिट्टी निकाल दी गई है. सूने घर आदि रूप क्षेत्र के पति को नमस्कार है. क्षेत्रीय व्याधियों अर्थात् अतिसार, यक्ष्मा आदि रोगों का विनाश करने वाली ओषधि सभी रोग दूर करे.

जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है

दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने इस विश्व को व्यक्त किया, उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस की स्तुति करती हैं.

हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें

जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें.

जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्री-पुरुष अपने मनोरथ में असफल होकर मेरी शरण में आएं

मेरे द्वारा अग्नि आदि देवों को दिया हुआ घृत आदि हवि दुष्ट राक्षसों को यहां से उसी प्रकार दूर हटा दे, जिस प्रकार नदी की धारा फेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है. मेरे प्रति अभिचार, जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्रीपुरुष अपने मनोरथ में असफल हो कर यहां मेरी शरण में आएं और मेरी स्तुति करें.

हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त करे

यह प्रातःकाल के समीप वाली रात उसी प्रकार हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त करे, जिस प्रकार प्रकाश के कारण अंधकार का विनाश होता है. रोग की शांति करते हुए आदित्य देव आएं. निश्चित ओषधि भी रोग का विनाश करे.

हम मंत्र रूपी वाणी से बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं

हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें.

शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे

जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.