आपस में प्रेम के लिए प्राप्त हुआ हूं

हे पत्नी! मैं तुझे सभी ओर व्याप्त एवं ईख के समान मधुर मधु के द्वारा आपस में प्रेम के लिए प्राप्त हुआ हूं.

अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें

सब से पहले अग्नि देव राक्षसों को दंड देना आरंभ करें. इस के पश्चात शक्तिशाली भुजाओं वाले इंद्र राक्षसों को दूर भगाएं. अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें और अपना परिचय दें कि मैं अमुक हूं.

इस ने मनुष्यों के मध्य अतिशय भाग्य पा लिया है

हे मणि! तेरे प्रभाव से यह पुरुष गृह से युक्त हो कर इस लोक में आ गया है. इस ने जीवित मनुष्यों के समूह को प्राप्त कर लिया है. यह पुत्रों का पिता बन गया है तथा इस ने मनुष्यों के मध्य अतिशय भाग्य पा लिया है.

रोग पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं

हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं.

देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं

पूर्व आदि दिशाओं की रक्षा करने वाले एवं कभी न मरने वाले इंद्र, यम आदि चार देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं. वे देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं.

यह सीसा राक्षसों का संहार करने वाला है

वरुण देव ने फेन के विषय में कहा है. सीसे जस्ते के विषय में अग्नि ने भी यही कहा है. परम ऐश्वर्ययुक्त इंद्र ने मुझे सीसा प्रदान किया है. इंद्र ने कहा है कि हे प्रिय! यह सीसा राक्षसों का संहार करने वाला है.

उन्हें नष्ट करने के लिए उन के समीप चलें

राक्षसों के विनाशक और रोगों को दूर करने वाले अग्नि देव उन्हें नष्ट करने के लिए उन के समीप चलें. अग्नि देव मायामय, सौम्य, हिंसक एवं भयावह रूप धारण करने वाले, दूसरों के दोष खोजने वाले, पीड़ादायक एवं परेशान करने वाले राक्षसों को भस्म करते हुए इस पुरुष के समीप आ रहे हैं.

मनुष्य निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें

हे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें.

जलोदर रोग वाले पुरुष को रोगमुक्त करता हूं

इंद्रादि देवों में वरुण पापियों को दंड देने वाले हैं. इस प्रकार के यह वरुण सब से उत्कृष्ट हैं. सभी पदार्थ तेजस्वी वरुण देव के वश में हैं. इसलिए मैं वरुण की स्तुति संबंधी मंत्रों से शक्ति प्राप्त कर के वरुण देव के प्रचंड कोप के कारण उत्पन्न जलोदर रोग वाले इस पुरुष को रोगमुक्त करता हूं.

हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त करे

यह प्रातःकाल के समीप वाली रात उसी प्रकार हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त करे, जिस प्रकार प्रकाश के कारण अंधकार का विनाश होता है. रोग की शांति करते हुए आदित्य देव आएं. निश्चित ओषधि भी रोग का विनाश करे.

इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया

शत्रु विनाशक एवं समस्त प्राणियों के मित्र इंद्र ने वृत्र राक्षस को आसुरी प्रजाओं के समान मार डाला. जिस प्रकार यज्ञ करते हुए अंगिरा गोत्रीय भृगुओं के यज्ञ का आधार गौ का हरण करने वाले बल नामक असुर को मार डाला था, उसी प्रकार इंद्र ने वृत्र का हनन किया. इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया.

दूसरों के दोष देखने वाले पिशाचों को भस्म कर दो

हे अग्नि देव! आप इन राक्षसों और दूसरों के दोष देखने वाले पिशाचों को भस्म कर दो. हे काले मार्ग वाले अग्नि ! दूसरों के प्रतिकूल आचरण करने वाली राक्षसियों को भी आप भस्म कर दें.

मैं शहद टपकाने वाले पदार्थ से भी अधिक मधुर हूं

हे मधु लता! मैं तुझ से उत्पन्न होने वाले शहद से भी अधिक मधुर हूं. मैं शहद टपकाने वाले पदार्थ से भी अधिक मधुर हूं. तुम निश्चय ही केवल मुझे उसी प्रकार प्राप्त हो जाओ, जिस प्रकार शहद वाली डाल के पास लोग पहुंच जाते हैं.

शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए

जो मूत्र तेरी आंतों में, मूत्रनाड़ी में एवं मूत्राशय में रुका हुआ है, वह तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए.

उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो

हे बृहस्पति आदि देवो! आप की स्तुति करता हुआ जो यह मनुष्य आप की शरण में आया है, यह हमारा विरोधी शत्रु है. हे बृहस्पति, अग्नि एवं सोम ! इन उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो.

जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए

जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए.

उन्नति के मार्ग में विघ्न डालने वाले पाप भी हमें न पा सकें

हे सोम देव! हमारा शत्रु अपने स्थान से भागा हुआ होने के कारण कभी भी अपनी स्त्री के पास न पहुंच सके. हे मरुत् देव! इस यज्ञ में आप हमारी रक्षा करें, सामने से आता हुआ तेजस्वी शत्रु मुझे प्राप्त न कर सके, कीर्ति और उन्नति के मार्ग में विघ्न डालने वाले पाप भी हमें न पा सकें.

तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो

हे अग्नि ! हम जिन देवों की स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हमारे समीप लाओ एवं हमें मारने की इच्छा से घूमने वाले राक्षसों को हम से दूर भगाओ. हे दिव्य गुणों वाले अग्नि ! हमारे नमस्कार आदि से प्रसन्न तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो.

सत्य धर्म वाले के कोप से मैं तेरी रक्षा करता हूं

हे जलोदर रोग से ग्रसित पुरुष! अपनी जिह्वा से तूने पाप का साधन असत्य भाषण अधिक किया है. मैं सत्य धर्म वाले एवं तेजस्वी वरुण के कोप से तेरी रक्षा करता हूं.

नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो

प्रसव की देवता पूषा गर्भ को जरायु के बंधन से अलग करें. हम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को खोल रहे हैं. तुम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को शिथिल करो. हे सूतिमारुत देव! आप भी गर्भ का मुख नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो.

शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें

सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्थमा देव हमारे हाथों और पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, 'भय मत करो', कहती हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है.

तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो

हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि ! तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि ! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ.

जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो

दिव्यगुणों वाला जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो. जल हमारे चारों और कल्याण की वर्षा करे एवं पीने के लिए उपलब्ध हो.

हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो

गंगा आदि नदियों की जो अक्षय धारा एवं झरने सदा बहते रहते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में कभी नहीं सूखते हैं, उन के कारण हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो.

राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ

हे अग्नि ! तुम रस्सी आदि से राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ. इस के पश्चात इंद्र अपने वज्र से उन के सिर काट दें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.