तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ

हे इंद्र ! निचोड़ा गया सोमरस तुम्हारे उदर में प्रवेश करे. तुम इस से अपनी दोनों कोखों को भर लो. तुम हमारा आह्वान सुन कर यहां आओ तथा हमारी स्तुतियां सुनो एवं उन्हें स्वीकार करो. हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में अपने मित्र मरुत् आदि देवों के साथ सोमरस पी कर तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ.

बुरे भाग्य वाली स्त्री चिरकाल तक पिता के घर रहे अर्थात् कभी पति का मुख न देखे

मनुष्य जिस प्रकार वृक्ष से माला बनाने हेतु फूल तोड़ता है, उसी प्रकार में इस स्त्री के भाग्य और तेज को स्वीकार करता हूं. धरती में भीतर तक धंसा हुआ पर्वत जिस प्रकार स्थिर रहता है, उसी प्रकार यह बुरे भाग्य वाली स्त्री चिरकाल तक पिता के घर रहे अर्थात् यह कभी पति का मुख न देखे.

ज्वर आदि रोग निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं

हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं.

धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है

जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है, वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले.

जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों

इंद्र आदि देव जिन जलों के सार रूप अमृत को द्युलोक में भक्षण करते हैं तथा जो जल अनेक प्रकार से स्थित रहते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं

स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं.

जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए

जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए.

इस अंग को अपने समान रंग वाला अर्थात् काला कर दे

हे ओषधि ! तेरी माता तेरे समान ही काले रंग वाली है. तेरा पिता आकाश भी तेरे ही समान नीले रंग का है. हे नील नामक ओषधि ! तू अपने संपर्क में आने वाले पदार्थ को अपने समान रंग वाला बना देती है. इसलिए कुष्ठ रोग से दूषित इस अंग को अपने समान रंग वाला अर्थात् काला कर दे.

वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो

हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र ! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो.

तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो

हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि ! तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि ! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ.

प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए

हे पुरुष ! में तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए.

सारी ओषधियां एवं अग्नि जल में निवास करती हैं

मुझे सोम ने बताया है कि सारी ओषधियां एवं अग्नि जल में निवास करती हैं. अग्नि सारे संसार का कल्याण करने वाली है.

मुंजवान पर्वत से उतर कर मूंज उत्तम जड़ीबूटी है

मुंजवान पर्वत से उतर कर जो मूंज धरती पर वर्तमान है, हे मूंज! तेरे उस अग्रभाग से मैं ओषधि बनाता हूं, क्योंकि तू उत्तम जड़ीबूटी है.

सूर्य के दर्शन करने के लिए मेरे शरीर को पुष्ट करो

हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समयतक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो.

जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो

दिव्यगुणों वाला जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो. जल हमारे चारों और कल्याण की वर्षा करे एवं पीने के लिए उपलब्ध हो.

तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ

हे मधु लता! तू मेरी जीभ के अग्र भाग पर शहद के समान स्थित हो तथा जीभ की जड़ में मधु रस वाले मधु नामक जल वृक्ष के फूल के रूप में वर्तमान रह. तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ.

उन्हें मैं मंत्र के प्रभाव से नष्ट करता हूं

हड्डियों से उत्पन्न, त्वचा से उत्पन्न एवं इन दोनों के मध्यवर्ती मांस से उत्पन्न कुष्ठ रोग के कारण जो श्वेत चिह्न शरीर पर उत्पन्न हो गए हैं, उन्हें मैं मंत्र के प्रभाव से नष्ट करता हूं.

ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें

द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने क्रोधित हो कर जो शाप दिया है - ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें.

हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए. जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो.

सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं

यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. में इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं.

सौ वर्ष की आयु पाने के लिए तुझे बांधता हूं

हे यजमान ! दक्ष की संतान महर्षियों ने सौमनस्य को प्राप्त हो कर राजा शतानीक के लिए जिस निर्दोष स्वर्ण को बांधा था, वही स्वर्ण में तेरी दीर्घ आयु, तेज, बल, एवं सौ वर्ष की आयु पाने के लिए तुझे बांधता हूं.

क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं

आकाश में स्थित, यज्ञ करने योग्य, सूर्य के समान वर्ण वाले एवं देव संबंधी क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं. वे पृथ्वी आदि लोकों के स्वामी, एकमात्र नमस्कार करने योग्य एवं शोभन सुख देने वाले हैं.

रोगों का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे

हे रोगी! तेरे रोग को शांत करने के लिए में बैल जुते हुए हलों को एवं हरण तथा जुए को नमस्कार करता हूं. क्षेत्रीय व्याधियों अर्थात् अतिसार, यक्ष्मा आदि रोगों का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे.

हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष, तुझे संपन्नता की अनुमति दें

हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष! मैं तुझे संवत्सरों की, महीनों की, ऋतुओं की एवं काल संबंधी दूध की धार से पूर्ण करता हूं. इंद्र और अग्नि तथा समस्त देव क्रोध न करते हुए तुझे संपन्नता की अनुमति दें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.