इस के बाद जल सागर की ओर इस प्रकार बहने लगा

पर्वत पर सोते हुए इस वृत्रासुर का इंद्र ने वध किया. वृत्र के पिता त्वष्टा ने इंद्र के लिए सुगमता से चलाया जाने वाला तथा तेज धारों वाला वज्र बनाया. इस के बाद जल सागर की ओर इस प्रकार बहने लगा, जिस प्रकार रंभाती हुई गाएं दौड़ती हैं.

देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं

पूर्व आदि दिशाओं की रक्षा करने वाले एवं कभी न मरने वाले इंद्र, यम आदि चार देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं. वे देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं.

उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है

हे जीवन को कष्ट पूर्ण बनाने वाले ज्वर! जिस अग्नि ने प्रवेश कर के जलों को जलाया अर्थात् गरम किया, यश, दान आदि धार्मिक कृत्य करने वालों ने जिस अग्नि में होम किया है, उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है. यह सब जानता हुआ तू गरम जल से स्नान करने वाले हमारे शरीर को त्याग कर अग्नि में प्रवेश कर.

मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे

हे सुशोभित सोम ! यह स्त्री पतिव्रता होने के कारण आप के कुल का पालन करने वाली है, इसलिए हम इसे रक्षा के लिए आप को देते हैं. यह तब तक अपने पिता के घर पर रहे. यह धरती पर सिर गिरने तक अर्थात् मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे.

हम मंत्र रूपी वाणी से बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं

हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें.

जो व्यक्ति तुम्हें धारण करता है, वह सभी साधनों से संपन्न हो जाता है

हे अभीवर्त मणि! सविता देव ने तुम्हारी वृद्धि की है और सोम देव ने तुम्हें समृद्ध बनाया है. हे मणि! सभी प्राणियों ने तुम्हारी वृद्धि की है. जो व्यक्ति तुम्हें धारण करता है, वह सभी साधनों से संपन्न हो जाता है.

हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता चंद्र को जानते हैं

हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता चंद्र को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! मैं उसी बाण से तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकले और धरती पर गिरे.

पीले रंग को गोपीतनक नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं

हे रोगी पुरुष! हम तेरे शरीर में रहने वाले रोग से उत्पन्न हरे रंग को स्रोतों में तथा रोपणक नामक पक्षियों में स्थापित करते हैं. हम तेरे हलदी के समान पीले रंग को गोपीतनक नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं.

सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं

सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं एवं नागलोक में निवास करती हैं. इन सांपों की केंचुली जरायु के समान उन से लिपटी रहती है. सांपों की उस केंचुली के द्वारा हम दूसरों का अहित सोचने वाले शत्रुओं की आंखों को ढकते हैं.

रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ

हे पथरी रोग उत्पन करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ.

जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है

दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने इस विश्व को व्यक्त किया, उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस की स्तुति करती हैं.

हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष, तुझे संपन्नता की अनुमति दें

हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष! मैं तुझे संवत्सरों की, महीनों की, ऋतुओं की एवं काल संबंधी दूध की धार से पूर्ण करता हूं. इंद्र और अग्नि तथा समस्त देव क्रोध न करते हुए तुझे संपन्नता की अनुमति दें.

तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो

हे ओषधि ! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि ! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके

आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुथ हमारी ओर आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके.

शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे

जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे.

जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं

मैं धनों के स्वामी एवं सुख साधन प्रदान कर के गतिशील मनुष्यों को एक स्थान पर बसाने वाले जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं.

रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए

हे रोग ग्रसित पुरुष! तेरे हृदय को संताप पहुंचाने वाला हृदय रोग एवं कामला आदि रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए. हे रोगी! गाय के लाल वर्ण से पहचाने जाने वाले के रूप में में तुझे स्वस्थ कराता हूं.

नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो

प्रसव की देवता पूषा गर्भ को जरायु के बंधन से अलग करें. हम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को खोल रहे हैं. तुम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को शिथिल करो. हे सूतिमारुत देव! आप भी गर्भ का मुख नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो.

वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे

मैं जलों के तेज, ज्योति, ओज और बल तथा वनस्पतियों का वीर्य उसी प्रकार धारण करता हूं, जिस प्रकार इंद्र में इंद्रियों के असाधारण चिह्न वर्तमान हैं. इसीलिए वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे.

सभी प्राणियों को वश में रखने वाले

विनाश रहित, क्षोभ न देने वाले, सभी प्रजाओं के पालनकर्ता, वृत्र नामक राक्षस अथवा जल के आधार मेघ को नष्ट करने वाले, शत्रुओं की विशेष रूप से हिंसा करने वाले, सभी प्राणियों को वश में रखने वाले, मनोकामनाओं की वर्षा करने वाले एवं सोमरस को पीने वाले इंद्र देव हमारे लिए अभय करने वाले बन कर संग्राम में हमारे नेता बनें.

द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं

हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं.

दिव्य सूर्य पृथ्वी आदि लोकों का पालनकर्ता है

दिव्य सूर्य पृथ्वी आदि लोकों का पालनकर्ता है. समस्त प्रजाओं के द्वारा वही अकेला नमस्कार करने एवं स्तुति के योग्य है. हे दिव्य सूर्य देव! मैं ब्रह्म के रूप में आप की आराधना करता हूं. आप को मेरा नमस्कार है. आप का आवास स्वर्ग में है.

जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है

अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है.

लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हम तुझे ढकते हैं

देवों की जो लाल रंग की कामधेनु आदि गाएं एवं मनुष्यों की जो लाल रंग की गाएं हैं, इन दोनों प्रकार के लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हे रोगी पुरुष! हम तुझे ढकते हैं.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.