द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं

हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं.

हानि पहुंचाने वाले शत्रु को अवनति रूपी अंधकार में पहुंचाओ

हे परम ऐश्वर्य युक्त इंद्र देव ! हमारी विजय के लिए हम से संग्राम करने वाले शत्रुओं का विनाश करो. जो युद्ध का प्रयत्न करने वाले शत्रु हैं, उन को पराजित करो. हमारे खेत, धन आदि छीन कर हमें हानि पहुंचाने वाले शत्रु को अवनति रूपी अंधकार में पहुंचाओ.

ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों

वाणी के स्वामी ब्रह्म का हम आह्वान करते हैं. हमारे द्वारा आह्वान किए गए ब्रह्म हमें अपने समीप बुलाएं. हम संपूर्ण ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों.

उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है

हे जीवन को कष्ट पूर्ण बनाने वाले ज्वर! जिस अग्नि ने प्रवेश कर के जलों को जलाया अर्थात् गरम किया, यश, दान आदि धार्मिक कृत्य करने वालों ने जिस अग्नि में होम किया है, उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है. यह सब जानता हुआ तू गरम जल से स्नान करने वाले हमारे शरीर को त्याग कर अग्नि में प्रवेश कर.

वे इस कार्य में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें

हे धन देने वाले देव कुबेर! मैं अपने अभिमत धन आदि प्राप्त करने के लिए हवि से इंद्र आदि देवों की प्रसन्नता के लिए हवन करता हूं. दिशाओं की रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों में जो चौथे देव कुबेर हैं, वे इस यज्ञ में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें.

जलोदर रोग वाले पुरुष को रोगमुक्त करता हूं

इंद्रादि देवों में वरुण पापियों को दंड देने वाले हैं. इस प्रकार के यह वरुण सब से उत्कृष्ट हैं. सभी पदार्थ तेजस्वी वरुण देव के वश में हैं. इसलिए मैं वरुण की स्तुति संबंधी मंत्रों से शक्ति प्राप्त कर के वरुण देव के प्रचंड कोप के कारण उत्पन्न जलोदर रोग वाले इस पुरुष को रोगमुक्त करता हूं.

सैकड़ों सामर्थों से संपन्न एवं बाण के पिता वरुण को जानते हैं

हम सैकड़ों सामर्थों से संपन्न एवं बाण के पिता वरुण को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! इसी बाण से मैं तेरे मूत्रादि रोगों को दूर करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे.

तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो

हे ओषधि ! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि ! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे.

मेरी संतान की एवं मेरे धन की रक्षा करो

हे मणि! मेरी, मेरी संतान की एवं मेरे धन की रक्षा करो. शत्रु हमारा अतिक्रमण न करे अर्थात् हमें पराजित न करे. हमारी हत्या करने के इच्छुक पिशाच आदि हमारी हिंसा न करें.

शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें

सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्थमा देव हमारे हाथों और पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, 'भय मत करो', कहती हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए

जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए.

जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है

अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है.

इस ने पहले आप को स्वीकार किया है

हे सुशोभित सोम ! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे.

वेदशास्त्र धारण करने की शक्ति एवं आनंदोपभोग के इच्छित साधन प्रदान करो

हे वाणी के स्वामी ब्रह्म! जिस प्रकार धनुष की डोरी चढ़ाने से उस के दोनों सिरे समान रूप से खिंच जाते हैं, उसी प्रकार मुझे वेदशास्त्र धारण करने की शक्ति एवं आनंदोपभोग के इच्छित साधन प्रदान करो.

शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो

हे धनुष की निंदनीय डोरी! तुम हमारी ओर न झुक कर हमारे शत्रुओं की ओर झुको. हे देवपति ! हमारे शरीरों को पत्थर के समान सुदृद्ध बनाओ, हमें शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो.

हे दिव्य किरणो, मैं तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूं

हे आकाश में जन्म लेने वाली, प्रकाशयुक्त एवं नक्षत्र रूपिणी किरणो! तुम में से जो विश्वावसु गंधर्व अर्थात् चंद्रमा के साथ संयुक्त होती हैं, हे दिव्य किरणो! मैं तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूं.

जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्री-पुरुष अपने मनोरथ में असफल होकर मेरी शरण में आएं

मेरे द्वारा अग्नि आदि देवों को दिया हुआ घृत आदि हवि दुष्ट राक्षसों को यहां से उसी प्रकार दूर हटा दे, जिस प्रकार नदी की धारा फेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है. मेरे प्रति अभिचार, जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्रीपुरुष अपने मनोरथ में असफल हो कर यहां मेरी शरण में आएं और मेरी स्तुति करें.

जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं

मैं धनों के स्वामी एवं सुख साधन प्रदान कर के गतिशील मनुष्यों को एक स्थान पर बसाने वाले जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं.

हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे

घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे.

वे हमें सुख प्रदान करें

नक्षत्रों को पराजित कर के प्रकट होने वाले, संसार में सब से प्रथम उत्पन्न एवं वायु के समान शीघ्रगामी सूर्य बादलों को गर्जन करने के लिए प्रेरित करते हुए वर्षा के साथ आते हैं. वे सूर्य त्रिदोष से उत्पन्न रोग आदि का विनाश करते हुए हमारी रक्षा करें. सीधे चलने वाले जो सूर्य एक हो कर भी अपने तेज को तीन प्रकार से प्रकाशित करते हैं, वे हमें सुख प्रदान करें.

प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र ! तुम हम पर प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो. हे शूर इंद्र! अपने घोड़ों की सहायता से तुम मेरे यज्ञ में आओ तथा इस यज्ञ में निचोड़े गए सोमरस को पियो. यह सोमरस प्रशंसनीय एवं मधुर है. पीने पर यह सोमरस तृप्ति और उत्तम मादकता का कारण बनता है.

शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे

जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे.

शरीर के छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं

हे शरीर के निचले भाग में वर्तमान नाड़ी! हे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित नाड़ी! हे शरीर के मध्य भाग में वर्तमान नाड़ी! तू भी स्थिर हो जा. रुधिर का प्रवाह बंद करने के लिए छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं.

हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें

जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.