मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष ! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी बनें.

प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए

हे पुरुष ! में तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए.

जल हमारे लिए सुखकारी हो, कल्याणकारी हों

जल हमें मरु भूमि में सुखकारी हों. जिन स्थानों में जल की प्राप्ति सुलभ है, वहां के जल हमारा कल्याण करें. कुआं, बावड़ी आदि खोद कर प्राप्त किए गए जल हमारे लिए कल्याणकारी हों. घड़े में भर कर लाया गया जल हमें सुख दे. वर्षा से प्राप्त होने वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो.

देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं

पूर्व आदि दिशाओं की रक्षा करने वाले एवं कभी न मरने वाले इंद्र, यम आदि चार देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं. वे देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं.

रोगों तथा घावों को दबाए रहे

जिस प्रकार पृथ्वी और द्युलोक के मध्य तेज रहता है, उसी प्रकार यह बाण बहुमूत्र, अतिसार (दस्त) आदि रोगों तथा घावों को दबाए रहे.

शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए

जो मूत्र तेरी आंतों में, मूत्रनाड़ी में एवं मूत्राशय में रुका हुआ है, वह तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए.

तिल की मंजरी से निर्मित मणि तेरा रोग दूर करे

मटमैले वर्ण के अर्जुन वृक्ष के काठ से, जी की भूसी से एवं तिल की मंजरी से निर्मित मणि तेरा रोग दूर करे. क्षेत्रीय व्याधियों, अतिसार, यक्ष्मा आदि का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोगों को दूर करे.

कुष्ठ रोग को नष्ट कर के त्वचा को पहले के समान स्वस्थ बनाया

आसुरी माया रूपी स्त्री ने सब से पहले कुष्ठ रोग दूर करने की ओषधि बनाई थी. नीली आदि ओषधियों ने कुष्ठ रोग को नष्ट कर के त्वचा को पहले के समान स्वस्थ बनाया.

रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए

हे व्याधिग्रस्त पुरुष! तेरी दीर्घायु के लिए हम तुझे गाय के समान लाल रंग से ढकते हैं. यह पुरुष पापरहित हो कर कामला आदि रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए.

जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है

जिस प्रकार गंधों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं जानते.

हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें

हमारी माता, हमारे पिता, हमारी गायों और सारे संसार का कल्याण हो. हमारी माता आदि उत्तम धन एवं श्रेष्ठ ज्ञान वाले हैं. हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें.

तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो

हे अग्नि ! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो.

वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो

हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र ! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो.

शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके

आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुथ हमारी ओर आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके.

पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे

हम सैकड़ों सामथ्यर्थों वाले एवं बाण के पिता मित्र अर्थात् सूर्य को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! इसी बाण से मैं तेरे मूत्रादि रोगों को नष्ट करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे.

सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की

बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने अपना शत्रुघातक वज्ज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की.

उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो

हे बृहस्पति आदि देवो! आप की स्तुति करता हुआ जो यह मनुष्य आप की शरण में आया है, यह हमारा विरोधी शत्रु है. हे बृहस्पति, अग्नि एवं सोम ! इन उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो.

हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए

हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए. जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो.

रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ

हे पथरी रोग उत्पन करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनों तथा इस जन का सुख बढ़ाओ.

जलों में ओषधियां निवास करती हैं

जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें.

इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ

हे अग्नि ! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं इस यजमान की इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ एवं उस के सौभाग्य के हेतु उत्साहित बनो. तुम्हारे सेवक ऋत्विज आदि नष्ट न हों. हे अग्नि ! तुम्हारे ऋत्विज् ब्राह्मण ही यशस्वी हैं, अन्य नहीं.

रोग पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं

हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं.

इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं

हे अग्नि ! आप और परम ऐश्वर्य वाले इंद्र, हमारे दिए गए हवि को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें. राक्षस, सब का भक्षण करने वाले दस्यु एवं इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं.

मुझ से सभी पापों को इस प्रकार धो कर दूर कर दे

पाप का विनाश करने वाली, देवों के द्वारा बनाई गई एवं पाप का निवारण करने वाली दूर्वा मुझ से सभी पापों को इस प्रकार धो कर दूर कर दे, जिस प्रकार पानी मैल को धो डालता है.

निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें

विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.