पूर्व, पश्चिम आदि चारों उत्तम दिशाएं तेरे लिए सुखकारी हों

हे रोगी पुरुष ! धरती और आकाश के मध्य तेरे लिए पक्षियों को धारण करने वाली वायु सुखकारी हो. पूर्व, पश्चिम आदि चारों उत्तम दिशाएं तेरे लिए सुखकारी हों. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से, उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों

आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों. संपत्ति देने वाले सविता देव हमारे मित्र हों. सविता देव अनेक प्रकार के धनों के स्वामी हैं. वे तथा इंद्र देव हमारे मित्र हैं.

ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें

द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने क्रोधित हो कर जो शाप दिया है - ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें.

शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे

हम सैकड़ों सामर्थों वाले एवं बाण के पिता पर्जन्य अर्थात् बादल को जानते हैं. हे मूत्ररोगी! मैं तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे.

मुंजवान पर्वत से उतर कर मूंज उत्तम जड़ीबूटी है

मुंजवान पर्वत से उतर कर जो मूंज धरती पर वर्तमान है, हे मूंज! तेरे उस अग्रभाग से मैं ओषधि बनाता हूं, क्योंकि तू उत्तम जड़ीबूटी है.

तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो

हे अग्नि ! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो.

रोग समाप्त करो एवं बहुत से रोगों का विनाश करो

हे ओषधि ! प्रयोग के तुरंत बाद रोग समाप्त करो एवं बहुत से रोगों का विनाश करो. तुम से संबंधित अनगिनत जड़ीबूटियां हैं, उन में तुम उत्तम हो. तुम अतिसार आदि रोग दूर करने वाली एवं इन के मूल कारणों का विनाश करने वाली हो.

जो मनुष्य हमें दास बनाना चाहता है, उन अमित्रों को

हमारी जाति का अधिक बली, शत्रु समान शक्ति वाला अथवा निकृष्ट बलशाली जो मनुष्य हमें दास बनाना चाहता है, हमारे उन अमित्रों को, सब को रुलाने वाले संहार कर्ता देव रुद्र अपने बाणों से बींध डालें.

इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ

हे अग्नि ! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं इस यजमान की इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ एवं उस के सौभाग्य के हेतु उत्साहित बनो. तुम्हारे सेवक ऋत्विज आदि नष्ट न हों. हे अग्नि ! तुम्हारे ऋत्विज् ब्राह्मण ही यशस्वी हैं, अन्य नहीं.

सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की

बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने अपना शत्रुघातक वज्ज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की.

जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है

जिस प्रकार गंधों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं जानते.

हमारे लिए पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान करो

हे अग्नि ! तुम इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न दोषों को, पाप बुद्धि वाले मनुष्यों को, देह का शोषण करने वाले रोगों को एवं हमारे शत्रुओं को समाप्त करो. तुम हमें समस्त पापों से पार करो तथा हमारे लिए पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान करो.

रोगों का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे

हे रोगी! तेरे रोग को शांत करने के लिए में बैल जुते हुए हलों को एवं हरण तथा जुए को नमस्कार करता हूं. क्षेत्रीय व्याधियों अर्थात् अतिसार, यक्ष्मा आदि रोगों का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोग दूर करे.

इस के बाद जल सागर की ओर इस प्रकार बहने लगा

पर्वत पर सोते हुए इस वृत्रासुर का इंद्र ने वध किया. वृत्र के पिता त्वष्टा ने इंद्र के लिए सुगमता से चलाया जाने वाला तथा तेज धारों वाला वज्र बनाया. इस के बाद जल सागर की ओर इस प्रकार बहने लगा, जिस प्रकार रंभाती हुई गाएं दौड़ती हैं.

नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो

प्रसव की देवता पूषा गर्भ को जरायु के बंधन से अलग करें. हम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को खोल रहे हैं. तुम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को शिथिल करो. हे सूतिमारुत देव! आप भी गर्भ का मुख नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो.

निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें

विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण करें.

पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया

मैं वज्रधारी इंद्र के उन वीरता पूर्ण कार्यों का वर्णन करता हूं जो उन्होंने पूर्व काल में किए हैं. उन्होंने वृत्रासुर का हनन किया तथा उस के बाद उस के द्वारा रोके गए जल को निकाल दिया एवं पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया.

तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो

हे अग्नि ! हम जिन देवों की स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हमारे समीप लाओ एवं हमें मारने की इच्छा से घूमने वाले राक्षसों को हम से दूर भगाओ. हे दिव्य गुणों वाले अग्नि ! हमारे नमस्कार आदि से प्रसन्न तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो.

सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं

सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं एवं नागलोक में निवास करती हैं. इन सांपों की केंचुली जरायु के समान उन से लिपटी रहती है. सांपों की उस केंचुली के द्वारा हम दूसरों का अहित सोचने वाले शत्रुओं की आंखों को ढकते हैं.

शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो

हे अग्नि ! हम ब्राह्मण तुम्हारी आराधना करते हैं. तुम हमारे प्रमादों को शांत करते हुए अथवा छिपाते हुए वर्तमान रहो. हे अग्नि! शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो. तुम प्रमाद न करते हुए अपने घर में जागृत रहो.

द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं

हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं.

यह महती ओषधि उस का समूल विनाश करती है

प्राणों का अपहरण करने वाले राक्षस एवं शरीर को निर्बल बनाने वाले रोग विशाल घाव के पकने के स्थान को नीचे से विदीर्ण करते हैं, यह महती ओषधि उस का समूल विनाश करती है तथा अतिसार आदि रोगों को जड़ से मिटा देती है.

प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए

हे पुरुष ! में तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए.

वह परमात्मा किस प्रकार का है?

वह सूर्यात्मक परमात्मा हमारा पालनकर्ता, जन्मदाता एवं बंधु है. वह स्वर्ग आदि स्थानों एवं वहां प्राप्त होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है. एकमात्र वही इंद्र आदि देवों का नाम रखने वाला है अथवा वह स्वयं ही इंद्र आदि नाम धारण करता है. इस प्रकार के परमात्मा को सभी प्राणी यह पूछते हुए प्राप्त होते हैं कि वह परमात्मा किस प्रकार का है?

हमें मृत्यु देव के पाशों से छुड़ाएं तथा पापों से हमारी रक्षा करें

जो दिशाओं का पालन करने वाले इंद्र आदि चार देव हैं, वे हमें मृत्यु देव के पाशों से छुड़ाएं तथा पापों से हमारी रक्षा करें.

रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है

हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में तू स्थित है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है

हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से, द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! में तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.

मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं

हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार में तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.