हम मंत्र रूपी वाणी से बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं

हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें.

अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं

जिस प्रकार माताएं अपनी इच्छा से दूध पिला कर बालकों को पुष्ट करती हैं, उसी प्रकार हे जल! आप अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं.

तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो

हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि ! तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि ! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ.

आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं

हे पर्जन्य ! विद्युत को मेरा नमस्कार हो. गर्जन करते हुए वज्र को मेरा नमस्कार हो. आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं.

जल हमारे लिए रोग नाशक और सुखकारक हों

सोने के रंग की शुद्ध अग्नियां एवं सविता जिन जलों से उत्पन्न हुए हैं, बादलों में स्थित जिन जलों में विद्युत रूपी अग्नि तथा सागर में स्थित जिन जलों में वाडवाग्नि उत्पन्न हुई है, जिन शोभन रंग वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग नाशक और सुखकारक हों.

सत्य धर्म वाले के कोप से मैं तेरी रक्षा करता हूं

हे जलोदर रोग से ग्रसित पुरुष! अपनी जिह्वा से तूने पाप का साधन असत्य भाषण अधिक किया है. मैं सत्य धर्म वाले एवं तेजस्वी वरुण के कोप से तेरी रक्षा करता हूं.

जल हमारे लिए सुखकारी हो, कल्याणकारी हों

जल हमें मरु भूमि में सुखकारी हों. जिन स्थानों में जल की प्राप्ति सुलभ है, वहां के जल हमारा कल्याण करें. कुआं, बावड़ी आदि खोद कर प्राप्त किए गए जल हमारे लिए कल्याणकारी हों. घड़े में भर कर लाया गया जल हमें सुख दे. वर्षा से प्राप्त होने वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो.

यह संसार पृथ्वी पर आश्रित है

सारा संसार आकाश से चारों ओर से घिरा हुआ है. यह संसार पृथ्वी पर आश्रित है. मैं संसार के धन के रूप में स्थित द्युलोक को तथा पृथ्वी को नमस्कार करता हूं.

जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो

हे हरिद्रा ! हलदी नामक ओषधि! तू रात में उत्पन्न हुई है. इसलिए तू शरीर की सफेदी दूर करने में समर्थ है. हे भृंगराज (भागरा) नामक ओषधि ! रंग काला कर देने वाली इंद्रावारुणि नामक ओषधि ! एवं असित वर्ण करने वाली नील नामक ओषधि ! तुम कुष्ठ रोग के कारण विकृत रंग वाले इस अंग को अपने रंग में रंग दो. वृद्धावस्था के कारण जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो.

हमारे शरीर से बाहर निकल जाओ

हे शीत ज्वर! तुम शरीर को शोकाकुल करने वाले, शरीर को सभी प्रकार से सुखाने वाले एवं तेजस्वी वरुण के पुत्र हो. तुम हूढ़ नाम से प्रसिद्ध हो. तुम हमारे गरम जल से भीगे हुए शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जाओ.

हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें

जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें.

जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है

अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है.

सूर्य के दर्शन करने के लिए मेरे शरीर को पुष्ट करो

हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समयतक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो.

घृत का भोजन कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए

हे स्वर्ग आदि उत्तम स्थानों में निवास करने वाले, हे जातवेद एवं हे जलशक्ति रूप में सब के शरीरों में स्थित जग्नि! हमारे द्वारा खुवा आदि से नाप कर दिए गए घृत का भोजन कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए.

तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ

हे मधु लता! तू मेरी जीभ के अग्र भाग पर शहद के समान स्थित हो तथा जीभ की जड़ में मधु रस वाले मधु नामक जल वृक्ष के फूल के रूप में वर्तमान रह. तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ.

पुरुष की वृद्धि करो एवं इसे अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनाओ

हे सब कुछ जानने वाले अग्नि ! आप ने जिन उत्तम मंत्रों द्वारा इंद्र के लिए दुग्ध, घृत आदि रस हवि के रूप में प्राप्त कराए, हे अग्नि ! उन्हीं मंत्रों के द्वारा इस पुरुष की वृद्धि करो एवं इसे अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनाओ.

सूर्योदय के साथ ही यहां आती हैं और सूर्यास्त के साथ चली जाती हैं

सूर्यरूपी गंधर्व निंदा के अयोग्य किरणों रूपी अप्सराओं से मिल गया था. समुद्र इन अप्सराओं का निवास स्थान कहा गया है, जहां से ये सूर्योदय के साथ ही यहां आती हैं और सूर्यास्त के साथ चली जाती हैं.

ज्वर आदि रोग निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं

हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं.

आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता

हे इंद्र! आप शासक और नियंता होने के कारण महान गुणों से युक्त हैं. आप शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं. आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता. शत्रु कभी भी उस का अपमान नहीं कर पाते.

जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए

जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए.

सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं

यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. में इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं.

तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो

हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं.

उचित-अनुचित कार्य के सोच-विचार से हमें बचाएं

असीमित सामर्थ्य वाली जंगिड़ मणि राक्षस के दांतों द्वारा खाए जाने से, शरीर के खंडखंड हो कर बिखरने से, रोग आदि रूप विघ्नों से, उचित अनुचित कार्य के सोचविचार से एवं जम्हाई आदि सब से हमें बचाएं.

शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो

हे धनुष की निंदनीय डोरी! तुम हमारी ओर न झुक कर हमारे शत्रुओं की ओर झुको. हे देवपति ! हमारे शरीरों को पत्थर के समान सुदृद्ध बनाओ, हमें शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो.